Wednesday, October 7, 2009
गजल
गम है क्या , खुशी क्या है
सोचता हूँ , जिंदगी क्या है
एक दौर था वो गुजर गया
मुझे हो रहा अभी क्या है
सब भीड़ में ही चल पड़ें
पहचान फिर नयी क्या है
साधु को सब कुछ है पता
नही जानता बस खुशी क्या है
तेरे होठों पर मुस्कान है
पर आँखों में ये नमी क्या है
गर पूरी हुई वो ख्वाहिश थी
खल रही फिर कमी क्या है
सोचता हूँ , जिंदगी क्या है
एक दौर था वो गुजर गया
मुझे हो रहा अभी क्या है
सब भीड़ में ही चल पड़ें
पहचान फिर नयी क्या है
साधु को सब कुछ है पता
नही जानता बस खुशी क्या है
तेरे होठों पर मुस्कान है
पर आँखों में ये नमी क्या है
गर पूरी हुई वो ख्वाहिश थी
खल रही फिर कमी क्या है
Wednesday, September 30, 2009
गजल
मैं बदल रहा हूँ इस दौर में
भीतर से जल रहा हूँ ,इस दौर में
आने वाले कल का नज़रिया लिए
बीता हुआ कल रहा हूँ ,इस दौर में
तुमने कभी जिनको सोचा नहीं
उन सवालों का हल रहा हूँ ,इस दौर में
परिवार, जिंदगी ,पैसा , करियर
कितने सांचों में ढल रहा हूँ ,इस दौर में
कुछ विचारों की छोटी सी गठरी लिए
तन्हा सा चल रहा हूँ ,इस दौर में
साल दर साल, घड़ी दर घड़ी
बन रहा हूँ ,पिघल रहा हूँ, इस दौर में
एक दिन जिंदगी मुझसे पूछेगी ज़रूर
मैं कितना सफल रहा हूँ , इस दौर में
भीतर से जल रहा हूँ ,इस दौर में
आने वाले कल का नज़रिया लिए
बीता हुआ कल रहा हूँ ,इस दौर में
तुमने कभी जिनको सोचा नहीं
उन सवालों का हल रहा हूँ ,इस दौर में
परिवार, जिंदगी ,पैसा , करियर
कितने सांचों में ढल रहा हूँ ,इस दौर में
कुछ विचारों की छोटी सी गठरी लिए
तन्हा सा चल रहा हूँ ,इस दौर में
साल दर साल, घड़ी दर घड़ी
बन रहा हूँ ,पिघल रहा हूँ, इस दौर में
एक दिन जिंदगी मुझसे पूछेगी ज़रूर
मैं कितना सफल रहा हूँ , इस दौर में
Monday, September 14, 2009
गजल
कई साल मैं एक घर में रहा
अजब सी घुटन में, फिकर में रहा
ख़बरों में जब मेरे चर्चे हुए
नज़र ना लगी ,पर नज़र में रहा
गए साल कुछ हादसे यूँ घटे
वक़्त कटता गया, दिल असर में रहा
बहुत खुशनुमा सा मेरा गाँव है
न जाने क्यूँ मैं शहर में रहा
एक बार पापा की उंगली थी छोड़ी
बाजार घुमा , पर डर में रहा
अजब सी घुटन में, फिकर में रहा
ख़बरों में जब मेरे चर्चे हुए
नज़र ना लगी ,पर नज़र में रहा
गए साल कुछ हादसे यूँ घटे
वक़्त कटता गया, दिल असर में रहा
बहुत खुशनुमा सा मेरा गाँव है
न जाने क्यूँ मैं शहर में रहा
एक बार पापा की उंगली थी छोड़ी
बाजार घुमा , पर डर में रहा
Wednesday, September 9, 2009
गजल
कई साल गुजरे घटा कुछ नहीं है
वही जिंदगी है ,नया कुछ नहीं है
नजरिया जरा सा बड़ा करके देखो
इन बेचेनियों की वजह कुछ नहीं है
बादल सुबह से ही छाए हुए हैं
बारिश का लेकिन पता कुछ नहीं है
तू हमेशा से ऐसा ही इंसान था
मुझे यार तुझसे गिला कुछ नहीं है
किसी छोटे बच्चे की आंखों मैं देखो
मासूमियत के सिवा कुछ नहीं है
वही जिंदगी है ,नया कुछ नहीं है
नजरिया जरा सा बड़ा करके देखो
इन बेचेनियों की वजह कुछ नहीं है
बादल सुबह से ही छाए हुए हैं
बारिश का लेकिन पता कुछ नहीं है
तू हमेशा से ऐसा ही इंसान था
मुझे यार तुझसे गिला कुछ नहीं है
किसी छोटे बच्चे की आंखों मैं देखो
मासूमियत के सिवा कुछ नहीं है
Tuesday, September 8, 2009
गजल
समेटे था हर हर्फ़ कितने फसाने
वो बात कह दी ग़ज़ल के बहाने
बहुत तेज बारिश मैं अपनी छतों पर
कई छोटे बच्चे आए हैं नहाने
दरख्तो से महरूम शहर के पंछियों के
बिजली के तारों पे हैं आशियाने
अपनी हस्ती बनाने की जद्दोजहद मैं
बहुत जल्दी बीते हैं ,बीते जमाने
सैकड़ों साइकिलों की क़तारों को देखो
कितने चूल्हे समेटे हैं ये कारखाने
वो बात कह दी ग़ज़ल के बहाने
बहुत तेज बारिश मैं अपनी छतों पर
कई छोटे बच्चे आए हैं नहाने
दरख्तो से महरूम शहर के पंछियों के
बिजली के तारों पे हैं आशियाने
अपनी हस्ती बनाने की जद्दोजहद मैं
बहुत जल्दी बीते हैं ,बीते जमाने
सैकड़ों साइकिलों की क़तारों को देखो
कितने चूल्हे समेटे हैं ये कारखाने
Tuesday, September 1, 2009
राम भरोसे
आज सुबह मैं आगरा से दिल्ली लौट रहा था। मैं हमेश ट्रेन से आता था पर आज सुबह जल्दी उठ गया तो सोच बस से चलता हूँ । सोचा था थोड़ा समय बचेगा और सफर और आसान हो जाएगा ।
सफर आसान और सुहाना ही था जब तक मैं दिल्ली के बाहरी इलाके मैं नहीं पहुँचा। जगह का नाम था - बदरपुर बॉर्डर । जो लोग समझते हैं दिल्ली बहुत आधुनिक सहर है, भारत की राजधानी है ,उन्हें दिल्ली के कुछ चुनिन्दा हिस्सों को जरूर देखना चाहिए । ऐसे स्थान मिथकों को तोड़ते हैं और सच्चाई को उजागर करते हैं ।
बदरपुर बॉर्डर पर आज कल दिल्ली मेट्रो का कार्य प्रगति पर है, कितने जोर शोर से भगवान जाने पर उस जगह की भीड़ को देखकर लगता है वहां कुम्भ का मेला लगा हुआ है । खासकर सुबह के समय सड़क पर मौजूद हर इंसान आपको परेशां ही दिखाई देगा और जो गाड़ियों मैं सफर करते हैं वो भी परेशां , जो लोग सड़क पर khaade होते हैं वो बस ,टेंपो आदि के इंतजार मैं परेशां होते हैं और जो गाड़ियों मैं होते हैं वो वहां वहां लगे जाम को देखकर सरकार को ,और न जाने किस किस को कोसते रहते हैं । सड़क के तीन चौथाई भाग पर मेट्रो का काम चल रहा है baaki १/४ भाग पर रोजमर्रा की जिंदगी । जिंदगी या तो thahari रहती है या फिर रेंग रेंग कर चलती है । तेज धुप और धूल ,आग मैं घी का काम करते है
ऐसा lagtaa है सब रुके हुए हैं जैसे किसी बाँध मैं पानी रुका रहता है , फर्क सिर्फ़ यह है की इस तरह के बाँध उर्जा पैदा नहीं करते , उर्जा सोख लेते हैं ।
भारत मैं निर्माण कार्य तो होते हैं पर उन निर्माण कार्यों से होने वाली असुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं देता । सरकार को इस बात का ध्यान तो रहता है की निर्माण कार्यों के लिए जगह चाहिए लेकिन सब ये बात भूल जाते हैं की भारत की जनसँख्या कितनी है badarpur border जैसे व्यस्त इलाकों से roj gujarne वाले लोगों और वाहनों का क्या होगा ?यातायात व्यवस्था कैसे चलेगी? बस सब चलता रहता है , अब इसमें कोई लेट हो ,जाम मैं फसे , किसी को कोसे , बीमार पड़े किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।
सब लोग अपनी तरफ़ से अच्छी तरह से तैयार होके अपने घर से ऑफिस के लिए निकलते हैं लेकिन ऑफिस तक पहुँचते पहुँचते उनकी क्या हालात होती है ये कई चीजों पर निर्भर करता ।
nirmaan कार्य पश्चिमी तरीके से हो रहा है लेकिन यातायात व्यवस्था देशी तरीके से चल रही है और आम आदमी इसे अपना भाग्य समझ कर संघर्ष कर रहा है , सब jee रहे हैं , अपनी ही samasyaon से घिरे हुए हैं ।
विकास अगर एकतरफा होता है तो वह संतुलन को प्रभावित करता है। ऐसी विषम परिस्थितियां ही इंसान को महान बनाती हैं , शायद हमारी सरकार चाहती है की दिल्ली महान लोगों का सहर बने ।
कोई भी आम इंसान अगर नौकरी के समय अपना पुरा काम मानसिक शान्ति के साथ करना चाहे तो यह इस बात पर बहुत निर्भर करता है की वह ऑफिस आने और जाने मैं कितना समय बिताता है और कितना संघर्ष करता है ।
एक आम इंसान की तरह मुझे भी समस्याएं ही दिखाई दे रही हैं समाधान नहीं लेकिन समाधान भी अवश्य होगा , जरूरत है है उसे खोजने की।
मैंने कई लोगों को देखा है , अच्छे कपड़े पहने ,चहेरे पर ताजगी और चमक , भविष्य के प्रति बहुत आशावान , परन्तु एक समस्या , उन्हें भी बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली की तरफ़ जाना होता ।
देश की abaadi बहुत ज्यादा है और पता नहीं इसमें किसका dosh है लेकिन सरकार को हमेशा ये बात ध्यान मैं rakhni चाहिए की कोई भी कार्य शुरू करने से pahle इस बात का ध्यान रहे की pahle से ही sangarsh कर रहे आम आदमी को और sanghaarsh नही करना पड़े ,अगर हर pahlu पर ध्यान दिया जाए तो samasyaon का समाधान निकल सकता है , बस जरूरत है थोड़ा maanviya थोड़ा sanvedansheel होने की। इस से shayaad हालात थोड़े sudhar jaayein वरना सब कुछ तो चल ही रहा है........raam भरोसे!
सफर आसान और सुहाना ही था जब तक मैं दिल्ली के बाहरी इलाके मैं नहीं पहुँचा। जगह का नाम था - बदरपुर बॉर्डर । जो लोग समझते हैं दिल्ली बहुत आधुनिक सहर है, भारत की राजधानी है ,उन्हें दिल्ली के कुछ चुनिन्दा हिस्सों को जरूर देखना चाहिए । ऐसे स्थान मिथकों को तोड़ते हैं और सच्चाई को उजागर करते हैं ।
बदरपुर बॉर्डर पर आज कल दिल्ली मेट्रो का कार्य प्रगति पर है, कितने जोर शोर से भगवान जाने पर उस जगह की भीड़ को देखकर लगता है वहां कुम्भ का मेला लगा हुआ है । खासकर सुबह के समय सड़क पर मौजूद हर इंसान आपको परेशां ही दिखाई देगा और जो गाड़ियों मैं सफर करते हैं वो भी परेशां , जो लोग सड़क पर khaade होते हैं वो बस ,टेंपो आदि के इंतजार मैं परेशां होते हैं और जो गाड़ियों मैं होते हैं वो वहां वहां लगे जाम को देखकर सरकार को ,और न जाने किस किस को कोसते रहते हैं । सड़क के तीन चौथाई भाग पर मेट्रो का काम चल रहा है baaki १/४ भाग पर रोजमर्रा की जिंदगी । जिंदगी या तो thahari रहती है या फिर रेंग रेंग कर चलती है । तेज धुप और धूल ,आग मैं घी का काम करते है
ऐसा lagtaa है सब रुके हुए हैं जैसे किसी बाँध मैं पानी रुका रहता है , फर्क सिर्फ़ यह है की इस तरह के बाँध उर्जा पैदा नहीं करते , उर्जा सोख लेते हैं ।
भारत मैं निर्माण कार्य तो होते हैं पर उन निर्माण कार्यों से होने वाली असुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं देता । सरकार को इस बात का ध्यान तो रहता है की निर्माण कार्यों के लिए जगह चाहिए लेकिन सब ये बात भूल जाते हैं की भारत की जनसँख्या कितनी है badarpur border जैसे व्यस्त इलाकों से roj gujarne वाले लोगों और वाहनों का क्या होगा ?यातायात व्यवस्था कैसे चलेगी? बस सब चलता रहता है , अब इसमें कोई लेट हो ,जाम मैं फसे , किसी को कोसे , बीमार पड़े किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।
सब लोग अपनी तरफ़ से अच्छी तरह से तैयार होके अपने घर से ऑफिस के लिए निकलते हैं लेकिन ऑफिस तक पहुँचते पहुँचते उनकी क्या हालात होती है ये कई चीजों पर निर्भर करता ।
nirmaan कार्य पश्चिमी तरीके से हो रहा है लेकिन यातायात व्यवस्था देशी तरीके से चल रही है और आम आदमी इसे अपना भाग्य समझ कर संघर्ष कर रहा है , सब jee रहे हैं , अपनी ही samasyaon से घिरे हुए हैं ।
विकास अगर एकतरफा होता है तो वह संतुलन को प्रभावित करता है। ऐसी विषम परिस्थितियां ही इंसान को महान बनाती हैं , शायद हमारी सरकार चाहती है की दिल्ली महान लोगों का सहर बने ।
कोई भी आम इंसान अगर नौकरी के समय अपना पुरा काम मानसिक शान्ति के साथ करना चाहे तो यह इस बात पर बहुत निर्भर करता है की वह ऑफिस आने और जाने मैं कितना समय बिताता है और कितना संघर्ष करता है ।
एक आम इंसान की तरह मुझे भी समस्याएं ही दिखाई दे रही हैं समाधान नहीं लेकिन समाधान भी अवश्य होगा , जरूरत है है उसे खोजने की।
मैंने कई लोगों को देखा है , अच्छे कपड़े पहने ,चहेरे पर ताजगी और चमक , भविष्य के प्रति बहुत आशावान , परन्तु एक समस्या , उन्हें भी बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली की तरफ़ जाना होता ।
देश की abaadi बहुत ज्यादा है और पता नहीं इसमें किसका dosh है लेकिन सरकार को हमेशा ये बात ध्यान मैं rakhni चाहिए की कोई भी कार्य शुरू करने से pahle इस बात का ध्यान रहे की pahle से ही sangarsh कर रहे आम आदमी को और sanghaarsh नही करना पड़े ,अगर हर pahlu पर ध्यान दिया जाए तो samasyaon का समाधान निकल सकता है , बस जरूरत है थोड़ा maanviya थोड़ा sanvedansheel होने की। इस से shayaad हालात थोड़े sudhar jaayein वरना सब कुछ तो चल ही रहा है........raam भरोसे!
Wednesday, August 26, 2009
कविता
दुःख होता है कभी -कभी
जब झूठ बोलता हूँ
ऐसे या वैसे
करता हूँ वो काम
जो मुझे नहीं करने चाहिए
खरा उतरता हूँ उपेक्षाओं पर
कितनी अजीब बात है
मैं जागरूक हूँ
मगर क्या फायदा
मैं सब कुछ बदलना चाहता हूँ
पर शायद अभी नहीं बदल सकता
इसीलिए कोशिश कर रहा हूँ
एक मध्यम मार्ग खोजने की
कितनी ही लोग
मेरी तरह ही सोचते होंगे
और
तलाशते होंगे सही मार्ग
उस से ही सारा अन्तर होगा
तब तक संगर्ष जारी है
एक बहाने के साथ , की
मैं भी इंसान हूँ
Monday, May 18, 2009
गजल

जब से खोया उसे कुछ भी पाया नहीं
हादसों ने मुझे कुछ सिखाया नहीं
एक कागज पे मैंने वो सब लिख दिया
मेरे सीने मैं जो कुछ समाया नहीं
आज सूरज वही रोज जैसा उगा
रौशनी मैं मगर मैं नहाया नहीं
रास्ते की तरफ़ देखता मैं रहा
उसको आना न था , वो आया नहीं
जिंदगी यूँ गुजारी अजब ढंग से
काम पूरा किया , दिल लगाया नहीं
हादसों ने मुझे कुछ सिखाया नहीं
एक कागज पे मैंने वो सब लिख दिया
मेरे सीने मैं जो कुछ समाया नहीं
आज सूरज वही रोज जैसा उगा
रौशनी मैं मगर मैं नहाया नहीं
रास्ते की तरफ़ देखता मैं रहा
उसको आना न था , वो आया नहीं
जिंदगी यूँ गुजारी अजब ढंग से
काम पूरा किया , दिल लगाया नहीं
जितने शिकवे रहे मेरे दिल मैं रहे
मैंने उसको कभी कुछ बताया नहीं
वक्त को थाम लूँ , ऐसी कोशिश करी
हाथ आना न था ,हाथ आया नहीं
मुझ से नाराज वो उम्र भर यूँ रहा
दूर जा न सका, पास आया नहीं
Friday, May 15, 2009
Thursday, April 23, 2009
Monday, April 20, 2009
कुछ सवालात मुझसे हर बार करती है,
जिंदगी फलसफों से इनकार करती है।
अपने होने का थोडा गुमान हो रहा है ,
एक लड़की मुझे भी प्यार करती है
मौके बहुत मुझको देती है जिंदगी,
यह रूकती है , थोडा इंतज़ार करती है।
टूटकर गिर रहे हों सितारे जमीं पर,
उसकी पायल कुछ ऐसे झंकार करती है।
मरने को, मैं तो मरा जा रहा हूँ ,
वजह कोई जीने को बेकरार करती है.
जिंदगी फलसफों से इनकार करती है।
अपने होने का थोडा गुमान हो रहा है ,
एक लड़की मुझे भी प्यार करती है
मौके बहुत मुझको देती है जिंदगी,
यह रूकती है , थोडा इंतज़ार करती है।
टूटकर गिर रहे हों सितारे जमीं पर,
उसकी पायल कुछ ऐसे झंकार करती है।
मरने को, मैं तो मरा जा रहा हूँ ,
वजह कोई जीने को बेकरार करती है.
Friday, April 17, 2009

दिल मेरा बादल का टुकडा , हल्का सा , आवारा सा
जाने क्या क्या सोचता है, नासमझ नाकारा सा
जब कभी भी सोचता हूँ, सारे गम खो जाते हैं
मेरी यादों मैं बसा है एक लम्हा ,प्यारा सा
खिलती हुई मुस्कान सा मिलता है मुझको हर सुबह
शाम को घर लौट ता है, थक चुका सा ,हारा सा
सिलसिला शायद कोई, अब शुरू होने को है
आज उनकी आंखों मैं चमका था कोई तारा सा
जाने क्या क्या सोचता है, नासमझ नाकारा सा
जब कभी भी सोचता हूँ, सारे गम खो जाते हैं
मेरी यादों मैं बसा है एक लम्हा ,प्यारा सा
खिलती हुई मुस्कान सा मिलता है मुझको हर सुबह
शाम को घर लौट ता है, थक चुका सा ,हारा सा
सिलसिला शायद कोई, अब शुरू होने को है
आज उनकी आंखों मैं चमका था कोई तारा सा
Friday, March 27, 2009
कभी कभी सोचता हूँ
कितना मुश्किल है ,
आज के इस दौर मैं
मन् को शांत रखना
ख़ुद के करीब आना
अनदेखा कर देना उन चीजों को
जो दिख रहीं हैं
और देखना उन चीजों को
जो दिखाई नहीं देती
दूसरों से कम बातें करना
शांत रहना
और अकेले मैं ख़ुद से बातें करना
अपने आप को देखना
दूसरों के नजरिये से
और दूसरों की जगह
ख़ुद को रखना
समझना उस आदमी को
जो आपका दिल दुखाता है
और इतनी समझ रखना
की किसी का दिल नहीं दुखे
अपने आप को
रोज बदलते रहना
उन लोगों के साथ रहते हुए
जो बरसों से नहीं बदले
भीड़ से भरी सड़कों पर
ऐसे चलना
जैसे चल रहे हों
किसी खाली सड़क पर
कितना मुश्किल है ,
आज के इस दौर मैं
मन् को शांत रखना
ख़ुद के करीब आना
अनदेखा कर देना उन चीजों को
जो दिख रहीं हैं
और देखना उन चीजों को
जो दिखाई नहीं देती
दूसरों से कम बातें करना
शांत रहना
और अकेले मैं ख़ुद से बातें करना
अपने आप को देखना
दूसरों के नजरिये से
और दूसरों की जगह
ख़ुद को रखना
समझना उस आदमी को
जो आपका दिल दुखाता है
और इतनी समझ रखना
की किसी का दिल नहीं दुखे
अपने आप को
रोज बदलते रहना
उन लोगों के साथ रहते हुए
जो बरसों से नहीं बदले
भीड़ से भरी सड़कों पर
ऐसे चलना
जैसे चल रहे हों
किसी खाली सड़क पर
Thursday, March 19, 2009

किसी बस मैं चढो दिल्ली मैं
सुबह को या शाम को
कई चहेरे दिखाई देते हैं
सोये से मुरझाये से
कोई बहुत जल्दी मैं होता है
कोई बहुत हताश होता है
कोई संघर्ष की तैयारी करके आया है
कोई इंतज़ार कर रहा है
आने वाले संघर्ष का
किसी के पास समय नहीं होता
एक दूसरे का हाल पूछने का
एक दूसरे की तरफ़ गौर से देखने का
सब खामोश होते हैं
चुप चाप खोये -खोये से
खिड़कियों से बाहर देखते हुए
गुजरने वाली कारों को देखते हुए
उनमें बैठे हुए लोगों को देखते हुए
कारों मैं बैठे लोग कितनी आराम से बैठे हैं
इस बारे मैं वो कभी नहीं सोचते
बस सोचते हैं की किसी तरह शाम हो
यह बस मेरे स्टाप तक पहुंचे
मैं अपने घर जाऊं
खाना खाकर सो जाऊं
और सुबह उठकर तैयार हो जाऊं
आने वाले संघर्ष के लिए
शायद ऐसे ही होते हैं
बसों मैं रोज बैठते लोग
सुबह को या शाम को
कई चहेरे दिखाई देते हैं
सोये से मुरझाये से
कोई बहुत जल्दी मैं होता है
कोई बहुत हताश होता है
कोई संघर्ष की तैयारी करके आया है
कोई इंतज़ार कर रहा है
आने वाले संघर्ष का
किसी के पास समय नहीं होता
एक दूसरे का हाल पूछने का
एक दूसरे की तरफ़ गौर से देखने का
सब खामोश होते हैं
चुप चाप खोये -खोये से
खिड़कियों से बाहर देखते हुए
गुजरने वाली कारों को देखते हुए
उनमें बैठे हुए लोगों को देखते हुए
कारों मैं बैठे लोग कितनी आराम से बैठे हैं
इस बारे मैं वो कभी नहीं सोचते
बस सोचते हैं की किसी तरह शाम हो
यह बस मेरे स्टाप तक पहुंचे
मैं अपने घर जाऊं
खाना खाकर सो जाऊं
और सुबह उठकर तैयार हो जाऊं
आने वाले संघर्ष के लिए
शायद ऐसे ही होते हैं
बसों मैं रोज बैठते लोग
Thursday, March 5, 2009
nowadays i m working in an ad agency in delhi . for that i have to travel a lot . it took me about half an hour to reach there and i go there by bus. this daily journey is quite unique in many ways. sometimes i thought it would be better if i take a bike but then there are benefits and draw backs of everything .its my own philosophy . u have to choose whether the benefits are more or drawbacks are less or vice versa. say if u go by bike u have to face the city traffic and pollution . pollution is so intense that by reaching the office color of ur clothes would have changed and ur eyes would be packed with sand particles. u have to wash ur face thoroughly . and to deal with the problem of traffic u have to choose again what strategy u would follow( among many ). many people follow the stndard rules and the traffic signals and others choose some creative ways to overcome these obstacles. they ridew their bikes on their own chosen paths , sometimes they jump their bikes on foot paths ,sometimes they use shortcuts and drive throughs "galiis". they make their own traffic rules and dare to cross red lights also .
i prefer going by bus . in this case difficulties over come benefits . first problem u will face while travelling in a delhi bus is crowd. india is the biggest democracy and the most densely populated also , we all know that but to feel that one must travel in a delhi city bus , specially the private , "blue line" busses are jam packed
i prefer going by bus . in this case difficulties over come benefits . first problem u will face while travelling in a delhi bus is crowd. india is the biggest democracy and the most densely populated also , we all know that but to feel that one must travel in a delhi city bus , specially the private , "blue line" busses are jam packed
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