Sunday, June 26, 2011

में और तुम...




जब भी में तुमसे बातें करता था
तुम चहकती रहती थी
किसी चिड़िया की तरह
और महकती रहती थी
किसी फूल की तरह
तुम कहती रहती थी वो सब
जो तुम्हें कहना होता था
और मुझे सुनना अच्छा लगता था
में तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाता था
दीखाता था ऐसे जैसे में वहीँ रहता हूँ
तुम्हारे शहर में
जबकि में रहता था उस शहर में
जो तुम्हारेशहर के बाद आता है
जहाँ का मौसम थोडा गंभीर है
जहाँ हवाएं थोड़ी धीमे चलतीहैं
पर में तुम्हें अपना पता कभी नहीं बताऊंगा
तुम शायद ढूँढ नहीं पाओगी
कहीं खो जाओगी
इसलिए
में चाहता हूँ
ये सब बस यूँ ही चलता रहे
में तुम्हें सुनता रहूँ
और तुम
चहकती रहो
किसी चिड़िया की तरह
और महकती रहो
किसी फूल की तरह.