मैं बदल रहा हूँ इस दौर में
भीतर से जल रहा हूँ ,इस दौर में
आने वाले कल का नज़रिया लिए
बीता हुआ कल रहा हूँ ,इस दौर में
तुमने कभी जिनको सोचा नहीं
उन सवालों का हल रहा हूँ ,इस दौर में
परिवार, जिंदगी ,पैसा , करियर
कितने सांचों में ढल रहा हूँ ,इस दौर में
कुछ विचारों की छोटी सी गठरी लिए
तन्हा सा चल रहा हूँ ,इस दौर में
साल दर साल, घड़ी दर घड़ी
बन रहा हूँ ,पिघल रहा हूँ, इस दौर में
एक दिन जिंदगी मुझसे पूछेगी ज़रूर
मैं कितना सफल रहा हूँ , इस दौर में
Wednesday, September 30, 2009
Monday, September 14, 2009
गजल
कई साल मैं एक घर में रहा
अजब सी घुटन में, फिकर में रहा
ख़बरों में जब मेरे चर्चे हुए
नज़र ना लगी ,पर नज़र में रहा
गए साल कुछ हादसे यूँ घटे
वक़्त कटता गया, दिल असर में रहा
बहुत खुशनुमा सा मेरा गाँव है
न जाने क्यूँ मैं शहर में रहा
एक बार पापा की उंगली थी छोड़ी
बाजार घुमा , पर डर में रहा
अजब सी घुटन में, फिकर में रहा
ख़बरों में जब मेरे चर्चे हुए
नज़र ना लगी ,पर नज़र में रहा
गए साल कुछ हादसे यूँ घटे
वक़्त कटता गया, दिल असर में रहा
बहुत खुशनुमा सा मेरा गाँव है
न जाने क्यूँ मैं शहर में रहा
एक बार पापा की उंगली थी छोड़ी
बाजार घुमा , पर डर में रहा
Wednesday, September 9, 2009
गजल
कई साल गुजरे घटा कुछ नहीं है
वही जिंदगी है ,नया कुछ नहीं है
नजरिया जरा सा बड़ा करके देखो
इन बेचेनियों की वजह कुछ नहीं है
बादल सुबह से ही छाए हुए हैं
बारिश का लेकिन पता कुछ नहीं है
तू हमेशा से ऐसा ही इंसान था
मुझे यार तुझसे गिला कुछ नहीं है
किसी छोटे बच्चे की आंखों मैं देखो
मासूमियत के सिवा कुछ नहीं है
वही जिंदगी है ,नया कुछ नहीं है
नजरिया जरा सा बड़ा करके देखो
इन बेचेनियों की वजह कुछ नहीं है
बादल सुबह से ही छाए हुए हैं
बारिश का लेकिन पता कुछ नहीं है
तू हमेशा से ऐसा ही इंसान था
मुझे यार तुझसे गिला कुछ नहीं है
किसी छोटे बच्चे की आंखों मैं देखो
मासूमियत के सिवा कुछ नहीं है
Tuesday, September 8, 2009
गजल
समेटे था हर हर्फ़ कितने फसाने
वो बात कह दी ग़ज़ल के बहाने
बहुत तेज बारिश मैं अपनी छतों पर
कई छोटे बच्चे आए हैं नहाने
दरख्तो से महरूम शहर के पंछियों के
बिजली के तारों पे हैं आशियाने
अपनी हस्ती बनाने की जद्दोजहद मैं
बहुत जल्दी बीते हैं ,बीते जमाने
सैकड़ों साइकिलों की क़तारों को देखो
कितने चूल्हे समेटे हैं ये कारखाने
वो बात कह दी ग़ज़ल के बहाने
बहुत तेज बारिश मैं अपनी छतों पर
कई छोटे बच्चे आए हैं नहाने
दरख्तो से महरूम शहर के पंछियों के
बिजली के तारों पे हैं आशियाने
अपनी हस्ती बनाने की जद्दोजहद मैं
बहुत जल्दी बीते हैं ,बीते जमाने
सैकड़ों साइकिलों की क़तारों को देखो
कितने चूल्हे समेटे हैं ये कारखाने
Tuesday, September 1, 2009
राम भरोसे
आज सुबह मैं आगरा से दिल्ली लौट रहा था। मैं हमेश ट्रेन से आता था पर आज सुबह जल्दी उठ गया तो सोच बस से चलता हूँ । सोचा था थोड़ा समय बचेगा और सफर और आसान हो जाएगा ।
सफर आसान और सुहाना ही था जब तक मैं दिल्ली के बाहरी इलाके मैं नहीं पहुँचा। जगह का नाम था - बदरपुर बॉर्डर । जो लोग समझते हैं दिल्ली बहुत आधुनिक सहर है, भारत की राजधानी है ,उन्हें दिल्ली के कुछ चुनिन्दा हिस्सों को जरूर देखना चाहिए । ऐसे स्थान मिथकों को तोड़ते हैं और सच्चाई को उजागर करते हैं ।
बदरपुर बॉर्डर पर आज कल दिल्ली मेट्रो का कार्य प्रगति पर है, कितने जोर शोर से भगवान जाने पर उस जगह की भीड़ को देखकर लगता है वहां कुम्भ का मेला लगा हुआ है । खासकर सुबह के समय सड़क पर मौजूद हर इंसान आपको परेशां ही दिखाई देगा और जो गाड़ियों मैं सफर करते हैं वो भी परेशां , जो लोग सड़क पर khaade होते हैं वो बस ,टेंपो आदि के इंतजार मैं परेशां होते हैं और जो गाड़ियों मैं होते हैं वो वहां वहां लगे जाम को देखकर सरकार को ,और न जाने किस किस को कोसते रहते हैं । सड़क के तीन चौथाई भाग पर मेट्रो का काम चल रहा है baaki १/४ भाग पर रोजमर्रा की जिंदगी । जिंदगी या तो thahari रहती है या फिर रेंग रेंग कर चलती है । तेज धुप और धूल ,आग मैं घी का काम करते है
ऐसा lagtaa है सब रुके हुए हैं जैसे किसी बाँध मैं पानी रुका रहता है , फर्क सिर्फ़ यह है की इस तरह के बाँध उर्जा पैदा नहीं करते , उर्जा सोख लेते हैं ।
भारत मैं निर्माण कार्य तो होते हैं पर उन निर्माण कार्यों से होने वाली असुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं देता । सरकार को इस बात का ध्यान तो रहता है की निर्माण कार्यों के लिए जगह चाहिए लेकिन सब ये बात भूल जाते हैं की भारत की जनसँख्या कितनी है badarpur border जैसे व्यस्त इलाकों से roj gujarne वाले लोगों और वाहनों का क्या होगा ?यातायात व्यवस्था कैसे चलेगी? बस सब चलता रहता है , अब इसमें कोई लेट हो ,जाम मैं फसे , किसी को कोसे , बीमार पड़े किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।
सब लोग अपनी तरफ़ से अच्छी तरह से तैयार होके अपने घर से ऑफिस के लिए निकलते हैं लेकिन ऑफिस तक पहुँचते पहुँचते उनकी क्या हालात होती है ये कई चीजों पर निर्भर करता ।
nirmaan कार्य पश्चिमी तरीके से हो रहा है लेकिन यातायात व्यवस्था देशी तरीके से चल रही है और आम आदमी इसे अपना भाग्य समझ कर संघर्ष कर रहा है , सब jee रहे हैं , अपनी ही samasyaon से घिरे हुए हैं ।
विकास अगर एकतरफा होता है तो वह संतुलन को प्रभावित करता है। ऐसी विषम परिस्थितियां ही इंसान को महान बनाती हैं , शायद हमारी सरकार चाहती है की दिल्ली महान लोगों का सहर बने ।
कोई भी आम इंसान अगर नौकरी के समय अपना पुरा काम मानसिक शान्ति के साथ करना चाहे तो यह इस बात पर बहुत निर्भर करता है की वह ऑफिस आने और जाने मैं कितना समय बिताता है और कितना संघर्ष करता है ।
एक आम इंसान की तरह मुझे भी समस्याएं ही दिखाई दे रही हैं समाधान नहीं लेकिन समाधान भी अवश्य होगा , जरूरत है है उसे खोजने की।
मैंने कई लोगों को देखा है , अच्छे कपड़े पहने ,चहेरे पर ताजगी और चमक , भविष्य के प्रति बहुत आशावान , परन्तु एक समस्या , उन्हें भी बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली की तरफ़ जाना होता ।
देश की abaadi बहुत ज्यादा है और पता नहीं इसमें किसका dosh है लेकिन सरकार को हमेशा ये बात ध्यान मैं rakhni चाहिए की कोई भी कार्य शुरू करने से pahle इस बात का ध्यान रहे की pahle से ही sangarsh कर रहे आम आदमी को और sanghaarsh नही करना पड़े ,अगर हर pahlu पर ध्यान दिया जाए तो samasyaon का समाधान निकल सकता है , बस जरूरत है थोड़ा maanviya थोड़ा sanvedansheel होने की। इस से shayaad हालात थोड़े sudhar jaayein वरना सब कुछ तो चल ही रहा है........raam भरोसे!
सफर आसान और सुहाना ही था जब तक मैं दिल्ली के बाहरी इलाके मैं नहीं पहुँचा। जगह का नाम था - बदरपुर बॉर्डर । जो लोग समझते हैं दिल्ली बहुत आधुनिक सहर है, भारत की राजधानी है ,उन्हें दिल्ली के कुछ चुनिन्दा हिस्सों को जरूर देखना चाहिए । ऐसे स्थान मिथकों को तोड़ते हैं और सच्चाई को उजागर करते हैं ।
बदरपुर बॉर्डर पर आज कल दिल्ली मेट्रो का कार्य प्रगति पर है, कितने जोर शोर से भगवान जाने पर उस जगह की भीड़ को देखकर लगता है वहां कुम्भ का मेला लगा हुआ है । खासकर सुबह के समय सड़क पर मौजूद हर इंसान आपको परेशां ही दिखाई देगा और जो गाड़ियों मैं सफर करते हैं वो भी परेशां , जो लोग सड़क पर khaade होते हैं वो बस ,टेंपो आदि के इंतजार मैं परेशां होते हैं और जो गाड़ियों मैं होते हैं वो वहां वहां लगे जाम को देखकर सरकार को ,और न जाने किस किस को कोसते रहते हैं । सड़क के तीन चौथाई भाग पर मेट्रो का काम चल रहा है baaki १/४ भाग पर रोजमर्रा की जिंदगी । जिंदगी या तो thahari रहती है या फिर रेंग रेंग कर चलती है । तेज धुप और धूल ,आग मैं घी का काम करते है
ऐसा lagtaa है सब रुके हुए हैं जैसे किसी बाँध मैं पानी रुका रहता है , फर्क सिर्फ़ यह है की इस तरह के बाँध उर्जा पैदा नहीं करते , उर्जा सोख लेते हैं ।
भारत मैं निर्माण कार्य तो होते हैं पर उन निर्माण कार्यों से होने वाली असुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं देता । सरकार को इस बात का ध्यान तो रहता है की निर्माण कार्यों के लिए जगह चाहिए लेकिन सब ये बात भूल जाते हैं की भारत की जनसँख्या कितनी है badarpur border जैसे व्यस्त इलाकों से roj gujarne वाले लोगों और वाहनों का क्या होगा ?यातायात व्यवस्था कैसे चलेगी? बस सब चलता रहता है , अब इसमें कोई लेट हो ,जाम मैं फसे , किसी को कोसे , बीमार पड़े किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ।
सब लोग अपनी तरफ़ से अच्छी तरह से तैयार होके अपने घर से ऑफिस के लिए निकलते हैं लेकिन ऑफिस तक पहुँचते पहुँचते उनकी क्या हालात होती है ये कई चीजों पर निर्भर करता ।
nirmaan कार्य पश्चिमी तरीके से हो रहा है लेकिन यातायात व्यवस्था देशी तरीके से चल रही है और आम आदमी इसे अपना भाग्य समझ कर संघर्ष कर रहा है , सब jee रहे हैं , अपनी ही samasyaon से घिरे हुए हैं ।
विकास अगर एकतरफा होता है तो वह संतुलन को प्रभावित करता है। ऐसी विषम परिस्थितियां ही इंसान को महान बनाती हैं , शायद हमारी सरकार चाहती है की दिल्ली महान लोगों का सहर बने ।
कोई भी आम इंसान अगर नौकरी के समय अपना पुरा काम मानसिक शान्ति के साथ करना चाहे तो यह इस बात पर बहुत निर्भर करता है की वह ऑफिस आने और जाने मैं कितना समय बिताता है और कितना संघर्ष करता है ।
एक आम इंसान की तरह मुझे भी समस्याएं ही दिखाई दे रही हैं समाधान नहीं लेकिन समाधान भी अवश्य होगा , जरूरत है है उसे खोजने की।
मैंने कई लोगों को देखा है , अच्छे कपड़े पहने ,चहेरे पर ताजगी और चमक , भविष्य के प्रति बहुत आशावान , परन्तु एक समस्या , उन्हें भी बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली की तरफ़ जाना होता ।
देश की abaadi बहुत ज्यादा है और पता नहीं इसमें किसका dosh है लेकिन सरकार को हमेशा ये बात ध्यान मैं rakhni चाहिए की कोई भी कार्य शुरू करने से pahle इस बात का ध्यान रहे की pahle से ही sangarsh कर रहे आम आदमी को और sanghaarsh नही करना पड़े ,अगर हर pahlu पर ध्यान दिया जाए तो samasyaon का समाधान निकल सकता है , बस जरूरत है थोड़ा maanviya थोड़ा sanvedansheel होने की। इस से shayaad हालात थोड़े sudhar jaayein वरना सब कुछ तो चल ही रहा है........raam भरोसे!
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