Wednesday, October 7, 2009

गजल

गम है क्या , खुशी क्या है
सोचता हूँ , जिंदगी क्या है

एक दौर था वो गुजर गया
मुझे हो रहा अभी क्या है

सब भीड़ में ही चल पड़ें
पहचान फिर नयी क्या है

साधु को सब कुछ है पता
नही जानता बस खुशी क्या है

तेरे होठों पर मुस्कान है
पर आँखों में ये नमी क्या है

गर पूरी हुई वो ख्वाहिश थी
खल रही फिर कमी क्या है