गम है क्या , खुशी क्या है
सोचता हूँ , जिंदगी क्या है
एक दौर था वो गुजर गया
मुझे हो रहा अभी क्या है
सब भीड़ में ही चल पड़ें
पहचान फिर नयी क्या है
साधु को सब कुछ है पता
नही जानता बस खुशी क्या है
तेरे होठों पर मुस्कान है
पर आँखों में ये नमी क्या है
गर पूरी हुई वो ख्वाहिश थी
खल रही फिर कमी क्या है
3 comments:
गजल का यह प्रयास सराहनीय है.मुझे लगता है आप इस विद्या पर काफी मेहनत कर रहे हैं. मैं किसी एक या अन्य शेर की तारीफ नहीं कर रहा हूँ, इस तरह मैं कमेन्ट करता भी नहीं. मुझे अभी यह गजल देखकर लगा कि आप अपनी मंजिल के रास्ते को पकड़ चुके हैं, आगे बढ़ते रहें, सफलता आपके कदम जरूर चूमेगी....शुभाशीष.
साधु को सब कुछ है पता
नही जानता बस खुशी क्या है
अंदाज़-ए-बयां अच्छा है. आगे बढ़िए. शुभकामनाएँ.
sunder rachana
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