Wednesday, September 30, 2009

गजल

मैं बदल रहा हूँ इस दौर में
भीतर से जल रहा हूँ ,इस दौर में

आने वाले कल का नज़रिया लिए
बीता हुआ कल रहा हूँ ,इस दौर में

तुमने कभी जिनको सोचा नहीं
उन सवालों का हल रहा हूँ ,इस दौर में

परिवार, जिंदगी ,पैसा , करियर
कितने सांचों में ढल रहा हूँ ,इस दौर में

कुछ विचारों की छोटी सी गठरी लिए
तन्हा सा चल रहा हूँ ,इस दौर में

साल दर साल, घड़ी दर घड़ी
बन रहा हूँ ,पिघल रहा हूँ, इस दौर में

एक दिन जिंदगी मुझसे पूछेगी ज़रूर
मैं कितना सफल रहा हूँ , इस दौर में

4 comments:

confessionsatforty said...

Dil se....its very good....but as i always say, complete the thought.

Gaurav Singh said...

Its very good Kapil .

हरकीरत ' हीर' said...

मैं बदल रहा हूँ इस दौर में
भीतर से जल रहा हूँ ,इस दौर में

आने वाले कल का नज़रिया लिए
बीता हुआ कल रहा हूँ ,इस दौर में

waah....!!

Har sher lajwaab lga ....!!

Anonymous said...

ग़ज़ल के विषय अच्छे लगे
आप आगरा में हो?
हम जल्दी ही आगरा आने वाले हैं, मिलना.