कई साल मैं एक घर में रहा
अजब सी घुटन में, फिकर में रहा
ख़बरों में जब मेरे चर्चे हुए
नज़र ना लगी ,पर नज़र में रहा
गए साल कुछ हादसे यूँ घटे
वक़्त कटता गया, दिल असर में रहा
बहुत खुशनुमा सा मेरा गाँव है
न जाने क्यूँ मैं शहर में रहा
एक बार पापा की उंगली थी छोड़ी
बाजार घुमा , पर डर में रहा
5 comments:
sexy yaar.. very nice...tu pahunch gaya bashir badr ke level pe...
Great words, nice thoughts, its just AWESOME .
बहुत अच्छा लगा कि आप भी आगरा से हैं. इस बहाने आपका ब्लाग देखने को मिला आप अच्ची गज़लें कहते हैं-
आज सूरज वही रोज जैसा उगा
रौशनी मैं मगर मैं नहाया नहीं
कमाल का शेर है.
अपने बारे में और भी बतायें आगरा में कहां निवास है? क्या करते हैं? सब कुछ बताइये हो सके तो मो.न. भी दे दें.
उम्मीद है जल्द मुलाकात भी होगी.
हर शेर लाजवाब...उम्दा ग़ज़ल....बहुत बहुत बधाई....
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी "में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...
awesome dude..........keep it uppppp
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