Wednesday, September 9, 2009

गजल

कई साल गुजरे घटा कुछ नहीं है
वही जिंदगी है ,नया कुछ नहीं है

नजरिया जरा सा बड़ा करके देखो
इन बेचेनियों की वजह कुछ नहीं है

बादल सुबह से ही छाए हुए हैं
बारिश का लेकिन पता कुछ नहीं है

तू हमेशा से ऐसा ही इंसान था
मुझे यार तुझसे गिला कुछ नहीं है

किसी छोटे बच्चे की आंखों मैं देखो
मासूमियत के सिवा कुछ नहीं है

5 comments:

Unknown said...

really such a nice n lovely poem kapil... n vry true it is....
according to today's lifestyle...
all the bst for ur future...

~~ NIDS ~~ said...

shabaash patthe || truly amazing || all d best || xpectin sum more frm u soon ||

Gaurav Singh said...

Hi Kapil,
I like the format of your writing.
Very Good.
Now you are on your way.

सर्वत एम० said...

गजल बहुत अच्छी कही है. आपके अंदर प्रतिभा है, योग्यता है और नये कंटेंट्स की समझ भी, बस कसर है जरा सी, गजल के शिल्प को थोड़ा मेहनत और समय देकर अपनी पकड़ मजबूत कर लें. आपके शहर या आसपास यदि कोई समर्थ रचनाकार हो तो उससे सीख और ज्ञान प्राप्त कर लें. यकीन करें, कल आपका ही है.

vermagaurav07 said...

Bahut sahi bhai lage raho. Bahur aachi gajal hai. k ghajal meri shaadi ke liye likh kar ready kar le. Samjha