समेटे था हर हर्फ़ कितने फसाने
वो बात कह दी ग़ज़ल के बहाने
बहुत तेज बारिश मैं अपनी छतों पर
कई छोटे बच्चे आए हैं नहाने
दरख्तो से महरूम शहर के पंछियों के
बिजली के तारों पे हैं आशियाने
अपनी हस्ती बनाने की जद्दोजहद मैं
बहुत जल्दी बीते हैं ,बीते जमाने
सैकड़ों साइकिलों की क़तारों को देखो
कितने चूल्हे समेटे हैं ये कारखाने
2 comments:
this is a very mature poem...infact it shows the refinement of thought and expression. very well written, kapil...am very proud of this achievemnet of yours....keep going !!!
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