Monday, May 18, 2009

गजल




जब से खोया उसे कुछ भी पाया नहीं
हादसों ने मुझे कुछ सिखाया नहीं

एक कागज पे मैंने वो सब लिख दिया
मेरे सीने मैं जो कुछ समाया नहीं

आज सूरज वही रोज जैसा उगा
रौशनी मैं मगर मैं नहाया नहीं

रास्ते की तरफ़ देखता मैं रहा
उसको आना न था , वो आया नहीं

जिंदगी यूँ गुजारी अजब ढंग से
काम पूरा किया , दिल लगाया नहीं
जितने शिकवे रहे मेरे दिल मैं रहे
मैंने उसको कभी कुछ बताया नहीं

वक्त को थाम लूँ , ऐसी कोशिश करी

हाथ आना न था ,हाथ आया नहीं

मुझ से नाराज वो उम्र भर यूँ रहा

दूर जा न सका, पास आया नहीं

5 comments:

methinks said...

gud going dude...
sahi jaa raha hai...

confessionsatforty said...

Woh jo na keh saka, maine sun liya,
jo na usey dikha, mein woh khwab tha,
na tha khwabon mein use yakeen,
maine bhi sunke, ansuna kiya..
kuch yehi raha afsaana hamare pya ka,
jo na khatam hua, na shuru hi tha!!

Gaurav Singh said...

Realy great .

वीनस केसरी said...

जिंदगी यूँ गुजारी अजब ढंग से
काम पूरा किया , दिल लगाया नहीं

सुन्दर गजल
मक्ता बहुत पसंद आया

वीनस केसरी

Unknown said...

gr8 bhai..gr8..