Thursday, March 19, 2009


किसी बस मैं चढो दिल्ली मैं
सुबह को या शाम को
कई चहेरे दिखाई देते हैं
सोये से मुरझाये से
कोई बहुत जल्दी मैं होता है
कोई बहुत हताश होता है
कोई संघर्ष की तैयारी करके आया है
कोई इंतज़ार कर रहा है
आने वाले संघर्ष का
किसी के पास समय नहीं होता
एक दूसरे का हाल पूछने का
एक दूसरे की तरफ़ गौर से देखने का
सब खामोश होते हैं
चुप चाप खोये -खोये से
खिड़कियों से बाहर देखते हुए
गुजरने वाली कारों को देखते हुए
उनमें बैठे हुए लोगों को देखते हुए
कारों मैं बैठे लोग कितनी आराम से बैठे हैं
इस बारे मैं वो कभी नहीं सोचते
बस सोचते हैं की किसी तरह शाम हो
यह बस मेरे स्टाप तक पहुंचे
मैं अपने घर जाऊं
खाना खाकर सो जाऊं
और सुबह उठकर तैयार हो जाऊं
आने वाले संघर्ष के लिए
शायद ऐसे ही होते हैं
बसों मैं रोज बैठते लोग

2 comments:

confessionsatforty said...

its good, but i think u r not very fair to those whotravel in the cars...dont they struggle ? struggle is a truth of everybody...just to travel in comfort, does not mean that their life is comfortable...at least the bus walas caught ur fancy and u wrote about them... car wallon ke liye to koi shayari bhi nahi karta hein !

storyteller said...

ok one day ill write about car walas also ,when ill travel in a car.